
एक लालची कुत्ता
एक बहुत सुंदर गांव था |
उस गांव में एक लालची कुत्ता रहता था उसका नाम कालू था |
कालू एक दिन बहुत भूखा था |
वह भोजन की तलाश में इधर-उधर पूरे गांव में भटक रहा था |
कालू को कसाई की दुकान के पास हड्डी का टुकड़ा मिला |
उसने मौका मिलते ही उस हड्डी को मुंह में दबाकर वहां से निकल गया | पास ही में एक नदी थी उसको पार करने के लिए उस पर एक पुल बना हुआ था | उस पूल को पार करते समय कालू ने अपनी ही परछाई पानी में देखी | कालू ने सोचा कि
“यह दूसरा कुत्ता कौन है ”
जिसने मेरी ही तरह दूसरी एक हड्डी का टुकड़ा मुंह में दबा रखा है|
कालू बहुत लालची था और साथ ही बहुत भूख भी था और वह अब दूसरी हड्डी भी लेना चाहता था |
कालू ने अपनी ही परछाई को देखकर जोर से भोंका | और जैसे ही वह भौंकने लगा उसकी हड्डी मुंह से पानी में गिर गई | तब उसने सोचा “अरे ;यह मैंने क्या किया ” दूसरी हड्डी लेने के चक्कर में मैंने अपनी हड्डी भी पानी में गिरा दी |यह सब देखकर कालू बहुत दुखी हुआ | और वह भूखा ही रह गया
” इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि-
” लालच बुरी बला है”
” लालच करने से हम अपना ही नुकसान कर बैठते हैं”